‘विशेष रिपोर्ट: ‘जनकल्याण’ के मंच पर सिस्टम की क्रूरता! 8 साल की सेवा का मिला ये सिला, नगर निगम के सफाईकर्मी ने खुद पर छिड़का पेट्रोल…

बेटी की बीमारी की सूचना देने पर छीनी नौकरी, एक महीने का वेतन भी रोका; गुहार सुनने के बजाय गाड़ी में बैठकर रवाना हुईं नगर निगम आयुक्त…
विशेष ब्यूरो:सरकारें बड़े-बड़े विज्ञापनों और ‘जनकल्याण शिविरों’ के जरिए दावा करती हैं कि आम जनता की समस्याओं का मौके पर ही निपटारा किया जा रहा है। लेकिन इस दावे के पीछे छिपी प्रशासनिक संवेदनहीनता की एक ऐसी खौफनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे शासन-प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
यह कहानी किसी रसूखदार की नहीं, बल्कि पिछले 8 सालों से शहर को साफ रखने वाले एक अदने से सफाई कर्मचारी की है, जिसे सिस्टम ने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।मामला क्या है? (संवाददाता की ग्राउंड रिपोर्ट)कैलवारा के रहने वाले संतोष करोसीय नगर निगम के वार्ड क्रमांक 1 में पिछले 8 वर्षों से आउटसोर्स सफाई कर्मचारी के रूप में पूरी निष्ठा से काम कर रहे थे। लेकिन महज 7 दिन पहले बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के उनकी आउटसोर्स आईडी बंद कर दी गई और उन्हें नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
पीड़ित का कसूर सिर्फ इतना था: उसकी मासूम बेटी की तबीयत खराब थी। एक पिता होने के नाते उसने इस बात की सूचना अपने वार्ड दरोगा को दी थी। लेकिन सहानुभूति की जगह उसे इनाम में मिला—नौकरी से निष्कासन और एक महीने की रुकी हुई तनख्वाह!जनकल्याण शिविर में ‘अंगारों’ पर सिस्टम: आत्मदाह का प्रयासनौकरी जाने और वेतन रुकने के बाद संतोष के परिवार के सामने भुखमरी और आर्थिक संकट खड़ा हो गया।
थक-हारकर वह आज सरकार द्वारा आयोजित ‘जनकल्याण शिविर’ में अपनी गुहार लेकर पहुंचा था। उसे उम्मीद थी कि यहाँ ‘मौके पर निराकरण’ होगा। लेकिन शिविर में बैठे अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।जब हर तरफ से निराशा हाथ लगी, तो पीड़ित संतोष ने हताशा में आकर शिविर के बीच ही अपने ऊपर पेट्रोल डालकर आग लगाने का प्रयास किया। मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों की मुस्तैदी से एक बहुत बड़ी अनहोनी टल गई, वरना आज इस ‘कल्याणकारी’ मंच पर एक गरीब की लाश बिछ चुकी होती।
संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: तमाशबीन कमिश्नर गाड़ी में बैठकर निकलींइस पूरे घटनाक्रम में सबसे शर्मनाक और हैरान करने वाला नजारा तब देखने को मिला, जब मौके पर मौजूद नगर निगम आयुक्त (कमिश्नर) ने मामले की गंभीरता को समझने या पीड़ित को ढांढस बंधाने के बजाय, वहां से भाग जाना बेहतर समझा।
साहब की गाड़ी रुकी नहीं: पीड़ित युवक अपनी नौकरी और हक के लिए गिड़गिड़ाता रहा, गोहार लगाता रहा।अफसरशाही का अहंकार: कमिश्नर मैडम अपनी चमचमाती गाड़ी में बैठीं और वहां से रफूचक्कर हो गईं।शासन और प्रशासन से सीधे सवालयह घटना केवल एक कर्मचारी की नौकरी जाने की नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि निचले स्तर के कर्मचारियों का किस तरह शोषण किया जा रहा है।
सवाल नंबर 1: 8 साल से सेवा दे रहे कर्मचारी को बिना किसी ‘कारण बताओ नोटिस’ या जांच के, सिर्फ मौखिक या मनमाने ढंग से कैसे निकाला जा सकता है?
सवाल नंबर 2: यदि सरकार के जनकल्याण शिविरों में जनता को आत्मदाह करने पर मजबूर होना पड़ रहा है, तो इन शिविरों का ढोंग किसके लिए रचा जा रहा है?
सवाल नंबर 3: जनता के टैक्स के पैसे से तनख्वाह पाने वाले बड़े अधिकारी (कमिश्नर) इतनी संवेदनहीन कैसे हो सकती हैं कि सामने एक व्यक्ति मरने जा रहा हो और वो गाड़ी में बैठकर निकल जाएं?
निष्कर्ष: एक तरफ शासन की योजनाएं जमीनी स्तर पर लाभ पहुंचाने का दम भरती हैं, तो दूसरी तरफ नगर निगम के भीतर चल रही यह तानाशाही दावों की हवा निकाल रही है। अब देखना यह है कि इस गंभीर घटना के बाद क्या पीड़ित संतोष करोसीय को उसकी नौकरी और रुका हुआ वेतन वापस मिलता है, या फिर यह मामला भी फाइलों के नीचे दबा दिया जाएगा?
प्रशासन को अब जवाब देना होगा!’ के मंच पर सिस्टम की क्रूरता 8 साल की सेवा का मिला ये सिला, नगर निगम के सफाईकर्मी ने खुद पर छिड़का पेट्रोलबेटी की बीमारी की सूचना देने पर छीनी नौकरी, एक महीने का वेतन भी रोका; गुहार सुनने के बजाय गाड़ी में बैठकर रवाना हुईं।
नगर निगम आयुक्तकटनी।। सरकारें बड़े-बड़े विज्ञापनों और ‘जनकल्याण शिविरों’ के जरिए दावा करती हैं कि आम जनता की समस्याओं का मौके पर ही निपटारा किया जा रहा है। लेकिन इस दावे के पीछे छिपी प्रशासनिक संवेदनहीनता की एक ऐसी खौफनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे शासन-प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह कहानी किसी रसूखदार की नहीं, बल्कि पिछले 8 सालों से शहर को साफ रखने वाले एक अदने से सफाई कर्मचारी की है, जिसे सिस्टम ने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।
मामला क्या है कैलवारा के रहने वाले संतोष करोसीय नगर निगम के वार्ड क्रमांक 1 में पिछले 8 वर्षों से आउटसोर्स सफाई कर्मचारी के रूप में पूरी निष्ठा से काम कर रहे थे। लेकिन महज 7 दिन पहले बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के उनकी आउटसोर्स आईडी बंद कर दी गई और उन्हें नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।पीड़ित का कसूर सिर्फ इतना था उसकी मासूम बेटी की तबीयत खराब थी।
एक पिता होने के नाते उसने इस बात की सूचना अपने वार्ड दरोगा को दी थी। लेकिन सहानुभूति की जगह उसे इनाम में मिला नौकरी से निष्कासन और एक महीने की रुकी हुई तनख्वाह।
जनकल्याण शिविर में ‘अंगारों’ पर सिस्टम: आत्मदाह का प्रयासनौकरी जाने और वेतन रुकने के बाद संतोष के परिवार के सामने भुखमरी और आर्थिक संकट खड़ा हो गया। थक-हारकर वह आज सरकार द्वारा आयोजित ‘जनकल्याण शिविर’ में अपनी गुहार लेकर पहुंचा था। उसे उम्मीद थी कि यहाँ ‘मौके पर निराकरण’ होगा। लेकिन शिविर में बैठे अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।
जब हर तरफ से निराशा हाथ लगी, तो पीड़ित संतोष ने हताशा में आकर शिविर के बीच ही अपने ऊपर पेट्रोल डालकर आग लगाने का प्रयास किया। मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों की मुस्तैदी से एक बहुत बड़ी अनहोनी टल गई, वरना आज इस ‘कल्याणकारी’ मंच पर एक गरीब की लाश बिछ चुकी होती।
संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: तमाशबीन कमिश्नर गाड़ी में बैठकर निकलीं इस पूरे घटनाक्रम में सबसे शर्मनाक और हैरान करने वाला नजारा तब देखने को मिला, जब मौके पर मौजूद नगर निगम आयुक्त (कमिश्नर) ने मामले की गंभीरता को समझने या पीड़ित को ढांढस बंधाने के बजाय, वहां से भाग जाना बेहतर समझा।

साहब की गाड़ी रुकी नहीं: पीड़ित युवक अपनी नौकरी और हक के लिए गिड़गिड़ाता रहा, गोहार लगाता रहा।
अफसरशाही का अहंकार: कमिश्नर मैडम अपनी चमचमाती गाड़ी में बैठीं और वहां से रफूचक्कर हो गईं।शासन और प्रशासन से सीधे सवालयह घटना केवल एक कर्मचारी की नौकरी जाने की नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि निचले स्तर के कर्मचारियों का किस तरह शोषण किया जा रहा है।
सवाल नंबर 1: 8 साल से सेवा दे रहे कर्मचारी को बिना किसी ‘कारण बताओ नोटिस’ या जांच के, सिर्फ मौखिक या मनमाने ढंग से कैसे निकाला जा सकता है?
सवाल नंबर 2: यदि सरकार के जनकल्याण शिविरों में जनता को आत्मदाह करने पर मजबूर होना पड़ रहा है, तो इन शिविरों का ढोंग किसके लिए रचा जा रहा है?
सवाल नंबर 3: जनता के टैक्स के पैसे से तनख्वाह पाने वाले बड़े अधिकारी (कमिश्नर) इतनी संवेदनहीन कैसे हो सकती हैं कि सामने एक व्यक्ति मरने जा रहा हो और वो गाड़ी में बैठकर निकल जाएं?एक तरफ शासन की योजनाएं जमीनी स्तर पर लाभ पहुंचाने का दम भरती हैं, तो दूसरी तरफ नगर निगम के भीतर चल रही यह तानाशाही दावों की हवा निकाल रही है।
अब देखना यह है कि इस गंभीर घटना के बाद क्या पीड़ित संतोष करोसीय को उसकी नौकरी और रुका हुआ वेतन वापस मिलता है, या फिर यह मामला भी फाइलों के नीचे दबा दिया जाएगा? प्रशासन को अब जवाब देना होगा!
