
31 वर्षों तक मां की ममता से विद्यार्थियों का भविष्य संवारने वाली शिक्षिका सरोज जाटव को भावभीनी विदाई, बरंगवा विद्यालय में छलके आंसू
कटनी। कुछ रिश्ते खून के नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और संस्कारों से बनते हैं। शिक्षक और विद्यार्थी का रिश्ता भी ऐसा ही होता है। शुक्रवार को कटनी जिले की एकीकृत शासकीय माध्यमिक शाला बरंगवा में यह रिश्ता उस समय भावनाओं के सैलाब में बदल गया, जब विद्यालय की वरिष्ठ शिक्षिका श्रीमती सरोज जाटव ने 31 वर्षों की गौरवपूर्ण शिक्षकीय सेवा के बाद सेवानिवृत्ति ग्रहण की। उनकी विदाई का क्षण इतना मार्मिक था कि विद्यालय परिसर बच्चों की सिसकियों और भावनाओं से गूंज उठा।
जैसे ही समारोह के दौरान बच्चों को अपनी प्रिय शिक्षिका से विदा लेने का अवसर मिला, वे खुद को संभाल नहीं सके। कोई उनके गले लगकर रो पड़ा, तो कोई उनका हाथ पकड़कर आंसू बहाने लगा। कई छात्राओं ने उन्हें मां की तरह गले लगाकर कहा, “मैडम हमें छोड़कर मत जाइए…”। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद शिक्षक, अभिभावक और अतिथियों की आंखें भी नम हो गईं।
31 वर्षों तक शिक्षा के साथ दिए संस्कार
श्रीमती सरोज जाटव ने अपने शिक्षकीय जीवन में केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि विद्यार्थियों को अनुशासन, ईमानदारी, मानवता और अच्छे संस्कारों का पाठ भी पढ़ाया। उन्होंने हर बच्चे को अपने परिवार के सदस्य की तरह अपनाया और उनकी सफलता को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि माना। यही कारण था कि उनकी विदाई एक शिक्षक की नहीं, बल्कि बच्चों की दूसरी मां की विदाई जैसी प्रतीत हुई।
विद्यालय परिवार ने पुष्पमालाएं पहनाकर, शॉल ओढ़ाकर एवं स्मृति-चिन्ह भेंट कर उनका सम्मान किया। समारोह में उपस्थित शिक्षकों ने कहा कि सरोज जाटव ने अपने पूरे सेवाकाल में समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा और सादगी का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा रहेगा।
सम्मान समारोह में उमड़ा आत्मीयता का सागर
कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों ने उनके शिक्षकीय योगदान की सराहना करते हुए कहा कि एक आदर्श शिक्षक कभी सेवानिवृत्त नहीं होता, क्योंकि उसके द्वारा दिए गए संस्कार और शिक्षा पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं। इस दौरान विद्यालय परिवार की ओर से उन्हें स्मृति-चिन्ह एवं सम्मान-पत्र भेंट कर उज्ज्वल, स्वस्थ एवं सुखमय सेवानिवृत्त जीवन की शुभकामनाएं दी गईं।
“मेरे बच्चे ही मेरी सबसे बड़ी कमाई हैं”
अपने सम्मान और बच्चों का स्नेह देखकर भावुक हुईं सरोज जाटव ने नम आंखों से कहा कि “31 वर्षों का यह सफर मेरे लिए केवल नौकरी नहीं, बल्कि एक परिवार के साथ बिताया गया जीवन था। मेरे विद्यार्थी ही मेरी सबसे बड़ी पूंजी और कमाई हैं। मैं चाहती हूं कि आप सभी जीवन में ईमानदार, संस्कारी और सफल इंसान बनें। यही मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होगा।”
उनके इन शब्दों के बाद पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा, लेकिन बच्चों की आंखों से बहते आंसू यह बता रहे थे कि उनकी प्रिय “मैडम” से बिछड़ने का दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।
बरंगवा विद्यालय में आयोजित यह विदाई समारोह केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि गुरु-शिष्य के उस अटूट रिश्ते का जीवंत उदाहरण बन गया, जहां सम्मान, स्नेह, संस्कार और अपनापन एक साथ दिखाई दिया। यह पल वहां उपस्थित हर व्यक्ति की स्मृतियों में हमेशा जीवित रहेगा।
