
कभी रूठना, कभी मनाना और फिर साथ में खिलखिलाना… नवरात्र के उत्सवी रंगों के बीच सामने आई भाई-बहन के निश्छल प्रेम की खूबसूरत तस्वीर, 15 वर्षीय जयराज सिंह चाहते हैं कि छोटी बहन बड़ी होकर उनके साथ करे गरबा
कटनी। रंग-बिरंगे परिधान, गरबा की थाप, चेहरे पर मुस्कान और चारों ओर उत्सव का उल्लास… शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर माधव नगर स्थित सिंधु भवन में आयोजित गरबा महोत्सव का माहौल हर किसी को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। कोई माता रानी की आराधना में लीन है, तो कोई संगीत की धुन पर थिरकते हुए उत्सव की खुशियां समेट रहा है। लेकिन इस उत्सवी माहौल के बीच एक ऐसी प्यारी-सी कहानी भी है, जो दिल को छू जाती है। यह कहानी है 15 वर्षीय जयराज सिंह और उनकी महज तीन साल की छोटी बहन निहारिका की, जिनकी नोकझोंक, शरारतों और एक-दूसरे के प्रति अटूट लगाव में भाई-बहन के रिश्ते की असली खूबसूरती झलकती है।
नन्ही बहन की पुकार में छिपी है ढेर सारी खुशियां
अमीरगंज की शुभ सिटी, जी-10 निवासी जयराज सिंह इस वर्ष पहली बार गरबा महोत्सव में शामिल हुए हैं। नवरात्र के रंगों और गरबा की थाप के बीच उनके मन में एक प्यारा-सा सपना पल रहा है। सपना अपनी छोटी बहन निहारिका के साथ गरबा करने का, उसके साथ कदम से कदम मिलाने का और इस खूबसूरत उत्सव की यादों को हमेशा के लिए संजो लेने का।
तीन साल की निहारिका अभी छोटी है। उसकी दुनिया में खेलना, हंसना, शरारत करना और अपने भैया के साथ मस्ती करना ही सबसे बड़ी खुशी है। कभी वह भाई के पीछे-पीछे घूमती है, तो कभी उसे अपने साथ खेलने के लिए मनाती है। भाई-बहन के बीच कभी छोटी-सी बात पर रूठना भी होता है और कभी अपनी बात मनवाने के लिए नन्ही बहन की मासूम जिद भी देखने को मिलती है।
लेकिन निहारिका को शायद यह अच्छी तरह पता है कि अपने भैया को मनाना कैसे है। थोड़ी देर की नाराजगी के बाद वह फिर उनके पास पहुंचती है और अपनी प्यारी आवाज में कहती है—
बस, फिर क्या! नन्ही बहन की यह पुकार रिश्तों में आई हर छोटी-सी नाराजगी को पीछे छोड़ देती है। कुछ ही पलों में रूठना-मनाना खत्म और फिर दोनों अपनी दुनिया में मस्त। यही तो बचपन है, जहां नाराजगी ज्यादा देर नहीं टिकती और प्यार हर बार जीत जाता है।
भाई-बहन की मस्ती में छिपा है रिश्ते का अनमोल खजाना
भाई-बहन का रिश्ता भी कितना अनोखा होता है। कभी खिलौनों को लेकर झगड़ा, कभी एक-दूसरे की बात न मानने पर नाराजगी, तो कभी बिना किसी वजह के हंसी-मजाक। लेकिन जब बात साथ खेलने और मस्ती करने की आती है, तो सारी शिकायतें अपने आप पीछे छूट जाती हैं।
जयराज और निहारिका के बीच भी कुछ ऐसा ही अपनापन है। नन्ही निहारिका के लिए उसके भैया केवल बड़े भाई नहीं, बल्कि खेल के साथी और खुशियों की दुनिया हैं। वहीं जयराज के लिए उनकी छोटी बहन परिवार की वह प्यारी-सी खुशी है, जिसकी मासूमियत चेहरे पर मुस्कान ले आती है।
निहारिका की छोटी-छोटी बातें, उसकी बालसुलभ शरारतें और बार-बार भैया को अपने साथ बुलाने की आदत इस रिश्ते को और खास बना देती है। उसकी दुनिया में शायद गरबा के कठिन कदमों का कोई मतलब नहीं, लेकिन भैया का हाथ पकड़कर उनके साथ नाचने की खुशी सबसे बड़ी है।
कभी वह भैया को मनाती है, तो कभी उनके साथ मस्ती करने की जिद करती है। उसकी इसी मासूमियत में वह अपनापन छिपा है, जिसे शब्दों में पूरी तरह बयां करना आसान नहीं।
जयराज का सपना—जब बड़ी होगी निहारिका, साथ थिरकेंगे दोनों
जयराज सिंह के मन में अपनी छोटी बहन के साथ गरबा करने की एक खूबसूरत कल्पना है। वह चाहते हैं कि जब निहारिका थोड़ी बड़ी हो जाए, तब दोनों भाई-बहन एक साथ गरबा महोत्सव में शामिल हों। गरबा की थाप पर साथ कदम मिलाएं, एक-दूसरे का हाथ थामकर नृत्य करें और नवरात्र की खुशियों को मिलकर जिएं।
आज निहारिका अपने भैया को गरबा करने के लिए बुलाती है। उसकी छोटी-सी आवाज में छिपी खुशी जयराज के मन में एक बड़ी-सी उम्मीद जगाती है। शायद आने वाले वर्षों में यही मासूम पुकार एक खूबसूरत याद बन जाएगी, जिसे दोनों भाई-बहन बड़े होकर मुस्कुराते हुए याद करेंगे।
जयराज का यह सपना किसी महंगे उपहार या बड़ी उपलब्धि से जुड़ा नहीं है। यह तो बस अपनी छोटी बहन के साथ समय बिताने, उसके बचपन का हिस्सा बनने और उसके साथ खुशियां बांटने की इच्छा है।
रिश्तों की असली दौलत भी तो यही है—अपने प्रियजनों के साथ बिताए गए वे छोटे-छोटे पल, जो समय गुजरने के बाद भी दिल में हमेशा जीवित रहते हैं।
परिवार का स्नेह, बच्चों की खुशियों का मजबूत आधार
जयराज के परिवार में उनकी मां रौशनी सिंह, पिता विशाल सिंह, बड़े चाचा गौरव सिंह, छोटे चाचा आशीष सिंह, दादा मदन मोहन सिंह और दादी सुखिया सिंह हैं। परिवार का स्नेह, बड़ों का आशीर्वाद और अपनों का साथ बच्चों के जीवन में खुशियों के साथ आत्मविश्वास भी भरता है।
बचपन में बच्चों को केवल सुविधाओं की ही नहीं, बल्कि परिवार के प्यार, समय और प्रोत्साहन की भी जरूरत होती है। जब परिवार उनकी छोटी-छोटी खुशियों को महत्व देता है, तो उनके सपनों को भी नई उड़ान मिलती है।
जयराज और निहारिका के रिश्ते में भी परिवार के इसी अपनत्व की झलक दिखाई देती है। भाई-बहन की मस्ती, एक-दूसरे को मनाने का अंदाज और साथ खुशियां मनाने की चाह यह बताती है कि परिवार की खूबसूरती केवल एक छत के नीचे रहने में नहीं, बल्कि एक-दूसरे की खुशियों में शामिल होने में है।
गरबा महोत्सव के रंगों में घुला भाई-बहन के प्यार का उत्सव
नवरात्र का पर्व मां दुर्गा की आराधना, आस्था और शक्ति का प्रतीक है। गरबा इसी उत्सव को उमंग, संगीत और सामूहिक आनंद से जोड़ता है। ऐसे आयोजन बच्चों को भारतीय संस्कृति से जुड़ने और परिवार के साथ यादगार पल बिताने का अवसर भी देते हैं।
माधव नगर के सिंधु भवन में आयोजित गरबा महोत्सव के बीच जयराज और निहारिका की यह कहानी उत्सव को एक अलग भावनात्मक रंग देती है। यहां गरबा की थाप केवल कदमों को नहीं थिरका रही, बल्कि रिश्तों में छिपी खुशियों को भी सामने ला रही है।
एक ओर 15 वर्षीय जयराज का अपनी छोटी बहन के साथ गरबा करने का सपना है, तो दूसरी ओर तीन साल की निहारिका की मासूम जिद है कि उसके भैया उसके साथ नाचें, खेलें और खूब सारी मस्ती करें।
कभी रूठना, कभी मनाना, कभी खिलखिलाकर हंसना और फिर हाथ पकड़कर साथ चल देना—भाई-बहन के रिश्ते का यही तो सबसे सुंदर संगीत है।
गरबा की थाप थम जाएगी, नवरात्र का उत्सव भी बीत जाएगा और समय के साथ बचपन की शरारतें यादों में बदल जाएंगी। लेकिन नन्ही निहारिका की आवाज में गूंजता ‘भैया चलो ना… गरबा करते हैं!’ और जयराज का उसके साथ गरबा करने का सपना शायद हमेशा उनके दिलों में बसा रहेगा।
क्योंकि जिंदगी में कुछ खुशियां ऐसी होती हैं, जिन्हें पाने के लिए किसी बड़ी उपलब्धि की जरूरत नहीं होती। बस अपनों का साथ, एक मासूम मुस्कान और हाथ थामकर साथ चलने का एहसास ही काफी होता है।
जयराज और निहारिका की यह प्यारी कहानी यही संदेश देती है कि त्योहारों की असली रौनक सजावट और रोशनी में ही नहीं, बल्कि उन रिश्तों में भी होती है, जो हमारी जिंदगी को प्यार, अपनत्व और खुशियों से भर देते हैं।
