
कटनी के शासकीय कन्या शिक्षा परिसर छात्रावास में भोजन, शुद्ध पेयजल, बिजली, वार्डन की अनुपस्थिति और शिक्षकों की कमी को लेकर छात्राओं ने तीन दिन तक किया धरना; तबीयत बिगड़ने के बाद प्रशासन हरकत में आया।
कटनी। देश और प्रदेश की सरकारें छात्राओं के बेहतर भविष्य के लिए शिक्षा, छात्रावासों और बालिका शिक्षा पर लगातार करोड़ों रुपये खर्च करने तथा विभिन्न योजनाओं के संचालन का दावा करती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में शिक्षा क्षेत्र में कई योजनाएं लागू हैं, जिनका उद्देश्य विद्यार्थियों को सुरक्षित वातावरण और बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना है। लेकिन कटनी जिले के एनकेजे थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम सरसवाही स्थित शासकीय कन्या शिक्षा परिसर छात्रावास की तस्वीर इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती दिखाई दे रही है।
यहां रहने वाली छात्राओं का आरोप है कि वे पिछले चार वर्षों से मूलभूत सुविधाओं के अभाव में रहने को मजबूर थीं। बार-बार शिकायत करने के बावजूद जब उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो उन्होंने 17 जुलाई से छात्रावास परिसर में धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया। छात्राओं का कहना है कि तीन दिनों तक वे अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठीं, लेकिन कोई जिम्मेदार अधिकारी उनकी सुध लेने नहीं पहुंचा।
स्थिति शनिवार को उस समय गंभीर हो गई जब दोपहर के दौरान एक-एक कर आधा दर्जन से अधिक छात्राओं की तबीयत बिगड़ने लगी। कई छात्राओं को सांस लेने में तकलीफ, पेट दर्द और चक्कर आने की शिकायत हुई। छात्रावास के प्रभारी प्राचार्य की भी तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद सभी को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया।
छात्राओं का आरोप है कि घटना के बाद भी जिला अस्पताल में उनकी स्थिति जानने कोई वरिष्ठ जिला अधिकारी नहीं पहुंचा। मामला समाचार पत्रों और मीडिया में प्रमुखता से सामने आने के बाद रविवार को कटनी एसडीएम प्रमोद चतुर्वेदी छात्रावास पहुंचे और व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया।
एसडीएम ने क्या कहा

एसडीएम ने बताया कि छात्राओं ने तीन दिनों तक धरना दिया था। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार मौसम में बदलाव, दूषित पानी के सेवन तथा लगातार बिजली बाधित रहने के कारण छात्राओं का स्वास्थ्य प्रभावित हुआ। उन्होंने कहा कि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है और छात्रावास की व्यवस्थाओं को सुधारने के निर्देश दिए गए हैं।
“चार साल से नहीं मिली मूलभूत सुविधाएं” — छात्रा सोनाली धुर्वे

कक्षा 12 कॉमर्स की छात्रा सोनाली धुर्वे ने बताया कि वे पिछले चार वर्षों से छात्रावास में रह रही हैं। उनके अनुसार यहां न तो नियमानुसार भोजन मिलता है और न ही स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था है। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रावास में नियुक्त महिला वार्डन नियमित रूप से छात्रावास में नहीं रहती थीं।
सोनाली ने बताया कि आर्ट्स विषय के शिक्षक भी उपलब्ध नहीं हैं, जबकि छात्राओं को उसी विषय में पढ़ाया जा रहा है। बिजली घंटों गुल रहने से पानी की आपूर्ति बंद हो जाती थी और मजबूरी में गंदा पानी पीना पड़ता था। भोजन भी निर्धारित मेन्यू के अनुरूप नहीं मिलता था। दाल और सब्जी में पानी अधिक और गुणवत्ता बेहद खराब रहती थी।
उन्होंने कहा कि जब छात्राओं ने धरना शुरू किया तब भी कोई अधिकारी नहीं आया। केवल तब प्रशासन सक्रिय हुआ जब छात्राओं की तबीयत बिगड़ गई और मामला मीडिया की सुर्खियां बना।
“17 दिनों से पानी की समस्या थी” — खुशबू मरावी

कक्षा 11 की छात्रा खुशबू मरावी ने बताया कि छात्रावास में करीब 17 दिनों से पानी की गंभीर समस्या बनी हुई थी। उनका कहना है कि अधिकारियों द्वारा नियमित निरीक्षण किए जाने के दावे सही नहीं हैं। धरना शुरू होने के बाद ही जिला शिक्षा अधिकारी आने लगे, जबकि इससे पहले कभी कोई अधिकारी निरीक्षण करने नहीं आया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि भोजन निर्धारित मेन्यू के अनुसार नहीं दिया जाता था।
“बाथरूम का पानी इस्तेमाल करना पड़ा” — मुस्कान बरकड़े

कक्षा 10 की छात्रा मुस्कान बरकड़े, निवासी ग्राम सगोना (ढीमखेड़ा), ने आरोप लगाया कि चार वर्षों में छात्रावास की वार्डन ने छात्राओं की समस्याओं और स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने बताया कि भोजन की गुणवत्ता बेहद खराब थी। सब्जी में अत्यधिक पानी मिलाकर परोसी जाती थी और कई बार ठीक से पकी भी नहीं होती थी।
मुस्कान ने बताया कि बिजली नहीं रहने पर पानी की आपूर्ति पूरी तरह बंद हो जाती थी। ऐसे में छात्राओं को मजबूरी में गंदे पानी का उपयोग करना पड़ता था। बाथरूमों की सफाई भी नहीं होती थी और वहां से आने वाली दुर्गंध के कारण सांस लेना तक मुश्किल हो जाता था।
“हम धूप में शौक से नहीं, मजबूरी में बैठे थे” — वर्षा कुडापे

कक्षा 12 आर्ट्स की छात्रा वर्षा कुडापे ने कहा कि वे तीन दिनों तक शुद्ध पेयजल और अन्य सुविधाओं की मांग को लेकर धूप में धरने पर बैठीं। यदि प्रशासन यह कह रहा है कि धूप में बैठने से उनकी तबीयत बिगड़ी, तो सवाल यह है कि आखिर उन्हें धूप में बैठने की नौबत क्यों आई? उन्होंने आरोप लगाया कि संबंधित शिक्षिका केवल वीडियो बनाकर अधिकारियों को भेजने की बात करती थीं, लेकिन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया।
“गंदा पानी बीमारी की वजह बना” — देविका

कक्षा 11 की छात्रा देविका ने बताया कि छात्रावास में दूषित पानी पीने के कारण छात्राओं का बीमार होना स्वाभाविक था। उनका कहना है कि जब हालात ज्यादा बिगड़े तब ग्राम पंचायत की ओर से पानी का टैंकर भेजा गया, लेकिन उसमें भी स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं था।
छात्राओं के आरोप
छात्राओं ने आरोप लगाया कि—

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चार वर्षों से छात्रावास में मूलभूत सुविधाओं का अभाव था।
भोजन निर्धारित मेन्यू के अनुसार नहीं मिलता था।
स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था नहीं थी।
कई दिनों तक बिजली बंद रहती थी, जिससे पानी की आपूर्ति भी बाधित रहती थी।
छात्रावास में नियुक्त वार्डन नियमित रूप से नहीं रहती थीं।
कई शिकायतें अधिकारियों तक पहुंचने ही नहीं दी जाती थीं।
धरना शुरू होने के बावजूद तीन दिनों तक कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा।
अब उठ रहे बड़े सवाल
यह पूरा मामला केवल छात्राओं की तबीयत बिगड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी छात्रावासों की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि छात्राओं के आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि छात्राओं के स्वास्थ्य और भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब केंद्र और प्रदेश सरकारें शिक्षा और छात्रावासों की व्यवस्थाओं को मजबूत करने के लिए लगातार बजट और योजनाएं चला रही हैं, तब जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का लाभ छात्राओं तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा? यदि छात्राएं चार वर्षों से समस्याओं से जूझ रही थीं तो संबंधित विभाग, छात्रावास प्रबंधन और जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते सुधारात्मक कदम क्यों नहीं उठाए?
(नोट: समाचार में छात्राओं के आरोप और एसडीएम का पक्ष दोनों शामिल किए गए हैं। संबंधित विभाग या अन्य अधिकारियों का विस्तृत पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रकाशित किया जाना चाहिए, ताकि समाचार संतुलित रहे।)
