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45 हजार के बिजली बिल से परेशान मजदूर महिला से लेकर रिकॉर्ड दुरुस्ती के लिए भटक रहे किसान तक—जनसुनवाई की व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल….


कटनी। जिला कलेक्टर कार्यालय में प्रत्येक मंगलवार को आयोजित होने वाली जनसुनवाई का उद्देश्य आम नागरिकों की समस्याओं का त्वरित निराकरण करना है, लेकिन जब शिकायतकर्ता महीनों और वर्षों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हों, तो स्वाभाविक रूप से व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। कटनी में ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जहां जनसुनवाई में आवेदन देने के बावजूद फरियादियों को राहत नहीं मिल पा रही है।

झिंझरी वार्ड क्रमांक 44 निवासी गुड्डी सिंह ने कलेक्टर के समक्ष शिकायत दर्ज कराते हुए बताया कि उनके घर का बिजली मीटर खराब होने के बाद अचानक उनका बिजली बिल हजारों रुपये में पहुंच गया। पहले 8421 रुपये का बिल आया, जिसका उन्होंने आर्थिक तंगी के बावजूद आंशिक भुगतान किया। इसके बाद मई माह में बिल बढ़कर 45 हजार 604 रुपये तक पहुंच गया।

गुड्डी सिंह का कहना है कि उनके घर में केवल चार सीएफएल बल्ब, एक कूलर और एक पंखा ही उपयोग में है। परिवार मजदूरी कर जीवन यापन करता है, ऐसे में इतना भारी-भरकम बिजली बिल उनके लिए किसी सदमे से कम नहीं है। शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया कि मीटर रीडर ने कथित रूप से 700 रुपये की मांग करते हुए कहा था कि पैसे नहीं देने पर हर माह हजारों रुपये का बिल आता रहेगा। महिला का कहना है कि विभागीय अधिकारियों से लगातार शिकायत के बावजूद आज तक समस्या का समाधान नहीं हुआ।
वहीं दूसरी ओर ग्राम कैलवारा खुर्द निवासी माखन कुशवाहा एवं उनके सहखातेदारों ने भी जनसुनवाई में आवेदन देकर राजस्व अभिलेख दुरुस्त कराने की मांग की है। आवेदकों का कहना है कि भूमि बंटवारे के संबंध में सक्षम न्यायालय द्वारा आदेश पारित किए जाने के बाद भी रिकॉर्ड को कंप्यूटर में अपडेट नहीं किया गया है। कई बार कार्यालयों के चक्कर लगाने के बावजूद राजस्व रिकॉर्ड में सुधार नहीं हो रहा, जिससे उन्हें लगातार परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
इन मामलों ने एक बार फिर जनसुनवाई व्यवस्था की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं। आमजन पूछ रहे हैं कि यदि शिकायतें केवल पोर्टल पर दर्ज होकर फाइलों में सीमित रह जाएं और उनका समयबद्ध निराकरण न हो, तो जनसुनवाई का वास्तविक उद्देश्य कैसे पूरा होगा?
जिले में ऐसे अनेक फरियादी हैं जो उम्मीद लेकर जनसुनवाई में पहुंचते हैं, लेकिन समाधान के इंतजार में महीनों तक भटकते रहते हैं। अब सवाल यह है कि क्या जनसुनवाई केवल आवेदन लेने की औपचारिकता बनकर रह गई है, या फिर संबंधित विभागों की जवाबदेही तय कर वास्तविक समाधान भी सुनिश्चित किया जाएगा?
कटनी की जनता की निगाहें अब प्रशासन पर टिकी हैं। आखिर कब तक फरियादी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते रहेंगे और कब उन्हें उनकी समस्याओं से वास्तविक राहत मिलेगी?
