
विभागीय उदासीनता का खामियाजा भुगत रहे हजारों ग्रामीण, जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंच रहे मासूम
तीन साल से टूटा पुल, चुनावी वादे कागजों में सिमटे; निरीक्षण, मंजूरी और आश्वासन के बाद भी निर्माण शुरू नहीं
ढीमरखेड़ा, कटनी।कटनी जिले के ढीमरखेड़ा जनपद क्षेत्र का सगमा पुल आज सरकारी तंत्र की सुस्त कार्यप्रणाली और कथित विभागीय लापरवाही का प्रतीक बन चुका है। लगभग तीन वर्ष पहले टूट चुके इस पुल के पुनर्निर्माण के लिए शासन द्वारा ₹11.25 करोड़ की प्रशासनिक स्वीकृति दी जा चुकी है, लेकिन आज तक निर्माण कार्य की एक ईंट तक नहीं रखी गई। करोड़ों रुपये की स्वीकृति के बावजूद धरातल पर सन्नाटा पसरा है, जबकि हजारों ग्रामीण हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर इस रास्ते से गुजरने को मजबूर हैं।
सबसे गंभीर और चिंताजनक स्थिति स्कूली बच्चों की है। शिक्षा का अधिकार देने का दावा करने वाला सरकारी तंत्र इन मासूमों को सुरक्षित रास्ता तक उपलब्ध नहीं करा पा रहा है। ढीमरखेड़ा और कटनी की ओर पढ़ाई के लिए जाने वाले बच्चों को प्रतिदिन टूटे पुल के नीचे से होकर गुजरना पड़ता है। बरसात में जब पुल के नीचे पानी भर जाता है, तब भी बच्चों के पास कोई दूसरा सुरक्षित विकल्प नहीं होता। ग्रामीणों का कहना है कि
ग्रामीण बताते हैं कि जब तक सगमा पुल सुरक्षित था, तब तक इस मार्ग पर बसों सहित अन्य यातायात के साधनों का नियमित संचालन होता था। पुल टूटने के बाद बस सेवा बंद हो गई और अब लालपुर, गोपालपुर, दसरमन, अतरसूमा तथा आसपास के गांवों के लोगों को रोज़ पैदल टूटे पुल के नीचे से होकर निकलना पड़ता है। चाहे पानी भरा हो या कीचड़, मजदूर, किसान, महिलाएं, बुजुर्ग और स्कूली बच्चे हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर इस रास्ते को पार करते हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव के दौरान विकास, सड़क और पुल निर्माण के बड़े-बड़े वादे किए गए थे, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही ये वादे भी फाइलों में कैद होकर रह गए। जनता पूछ रही है कि जब पुल नहीं टूटा था तब बसें चल रही थीं, लोग सुरक्षित आवागमन कर रहे थे, लेकिन पुल टूटने के बाद तीन वर्षों तक आखिर जिम्मेदार विभाग क्या करता रहा?
ग्रामीणों के अनुसार भाजपा सिलौड़ी मंडल अध्यक्ष मनीष सिंह बागरी ने सबसे पहले इस समस्या को प्रमुखता से उठाया और लगातार शासन-प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद क्षेत्रीय विधायक धीरेन्द्र बहादुर सिंह ने 8 जुलाई 2024 को लोक निर्माण मंत्री को पत्र लिखकर पुल निर्माण की मांग की। उनके प्रयासों के बाद शासन ने ₹11.25 करोड़ की प्रशासनिक स्वीकृति भी प्रदान कर दी। इसके बावजूद निर्माण कार्य आज तक शुरू नहीं होना ग्रामीणों की समझ से परे है।
ग्रामीण बताते हैं कि विधायक धीरेन्द्र बहादुर सिंह तथा जिला पंचायत सदस्य क्षेत्र क्रमांक-4 कविता पंकज राय ने स्वयं मौके पर पहुंचकर पुल का निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान शीघ्र निर्माण का भरोसा दिया गया, लेकिन समय बीतता गया और पुल वहीं का वहीं पड़ा रहा। लोगों का कहना है कि यदि निरीक्षण और स्वीकृति के बाद भी निर्माण शुरू नहीं हो पा रहा है, तो कहीं न कहीं विभागीय स्तर पर गंभीर लापरवाही या प्रशासनिक ढिलाई अवश्य है।
इस पुल के बंद होने का असर केवल आवागमन तक सीमित नहीं है। किसान अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने के लिए अतिरिक्त खर्च उठा रहे हैं, मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में एम्बुलेंस को लंबा रास्ता तय करना पड़ता है और कई बार आपातकालीन सेवाएं भी प्रभावित होती हैं। सबसे अधिक नुकसान स्कूली बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है, क्योंकि हर दिन उन्हें जोखिम भरे रास्ते से होकर स्कूल पहुंचना पड़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि शासन करोड़ों रुपये स्वीकृत करने के बाद भी निर्माण कार्य शुरू नहीं करा पा रहा है, तो यह केवल प्रशासनिक देरी नहीं बल्कि जनता के विश्वास के साथ अन्याय है। लोगों ने मांग की है कि पुल निर्माण में हो रही देरी की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और तत्काल निर्माण कार्य शुरू कराया जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शासन ने ₹11.25 करोड़ की राशि स्वीकृत कर दी, जनप्रतिनिधियों ने निरीक्षण कर लिया, ग्रामीण लगातार आवाज उठा रहे हैं और मासूम बच्चे रोज़ अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूल जा रहे हैं, तब आखिर लोक निर्माण विभाग किस आदेश का इंतजार कर रहा है? यदि किसी दिन इस लापरवाही की कीमत किसी बच्चे की जान से चुकानी पड़ी, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?
